Thursday, March 17, 2016

    सही बुखारी पढ़ें

    Thursday, November 19, 2015

    Apne phone me ulte word kaise likhen अपने फोन में उलटे शब्द कैसे लिखें U...







    अपने फोन में उलटे शब्द कैसे लिखें  how to write reverse word with fancy key app

    अपने स्मार्टफोन में fancy key app डाउनलोड कीजिए सैटिंग सेटअप कीजिये और लिखिए अलग अलग तरीके के शब्द जैसे

    Hi i am hakeem danish how are you



    noʎ əɹɐ ʍoɥ ɥsıuɐp ɯəəʞɐɥ ɯɐ ı ıɥ



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    Friday, November 6, 2015

    ghost in Saudi Arabia Saudi Arab me Ek Ghar me Bhoot

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    Sunday, November 1, 2015

    Bhoot in Saudi Arabia Saudi Arab me Ek Ghar me Bhoot

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    Tuesday, September 15, 2015

    काश कोई ये पत्र प्रधान मंत्री तक पहुचा दे

    माननीय प्रधानमंत्री जी,

    मैं यह पत्र आप पर आक्षेप लगाने के लिए नहीं लिख रहा हूं। न ही मैं चाहता हूं कि इसका आधार बनाकर आलसी विरोधी दल आप पर राजनीतिक आक्षेप लगाएं। हम एक पत्रकार के तौर पर रोज़ाना ऐसी कथाओं से गुज़रते हैं। यह भी उचित नहीं होगा कि हम सारे मामलों को आपकी तरफ़ मोड़ दें और आपको पत्र लिखते रहें। देश की तमाम संस्थाओं की अलग अलग जवाबदेही तय है और मैं मानता हूं कि जिसकी जो जवाबदेही है उसी से अंतिम चरण तक संवाद करना चाहिए। पर यह मामला कुछ ऐसा है कि मुझे लगता है कि आपके हस्तक्षेप की ज़रूरत है। फ़ौरी मदद के साथ साथ कुछ व्यापक कदम उठाये जाने की ज़रूरत है।

    शैलेश गोरानिया गुजरात के तापी ज़िले का किसान है। तीस साल का यह किसान दिल्ली तक चलकर मुझसे मिलने आया था। शरीर से हट्टाकट्ठा इस किसान नौजवान की आंखें लाल थीं। गला इतना भरा हुआ था कि रूक रूक कर बात कर रहा था। साथ में तौलिये का रूमाल लाया था। उससे अपने चेहरे को छुपाता हुआ मुझसे बात किये जा रहा था। इसकी आंखें कई दिनों से सोईं नहीं हैं सर, आंसू सूखकर लाल हो गए हैं। कपास की खेती ने इसे कंगाल बना दिया है। कपास की खेती ने न जाने कितने किसानों को कंगाल बनाया होगा, लेकिन शैलेश गोरानिया ने कहा कि मैं बोलना चाहता हूं। मैं इस मुल्क को एक मौका देना चाहता हूं कि मैं बोलूं और वो सुने। मैं हारने से पहले बताना चाहता हूं कि वो सुने कि एक किसान का दर्द क्या है।

    सर, जिस लहज़े में लिख रहा हूं बिल्कुल उसी लहज़े में शैलेश गोरानिया बात कर रहा था। ऐसा नहीं है कि उसकी बात को मैं अपने हुनर का लाभ उठाकर मार्मिक बना रहा हूं। शैलेश ने कहा कि मीडिया से पैसा नहीं मांग रहा। आप मीडिया के ज़रिये देश को बता दो। उन तीस लोगों को बता दो, कैसे बताना है आप देख लो। मैंने काफी समय लेकर उसे समझाया कि किसी ग़लत रास्ते पर मत निकल जाना। हारना मत। सर, मैंने आपका ही उदाहरण दिया कि देखो जब वे चाय बेचते बेचते यहां तक पहुंचे हैं तो ज़रूर उनके जीवन में विकट परिस्थितियां आईं होंगी। शैलेश गोरानिया ने कहा कि वो सब जानता है। आपको पसंद करता है लेकिन वो अब टूटने लगा है।

    शैलेश, उसका छोटा भाई और पिता ये तीनों मिलकर हर साल पचास एकड़ ज़मीन किराये पर लेते हैं। इस ज़मीन में कपास की खेती के लिए 10 से 12 लाख की लागत आती है। किराये का साढ़े चार लाख अलग। ये पैसा वे अपने रिश्तेदार वगैरह से कर्ज़ लेकर लगाते हैं। तीन साल तक इतनी लागत से बीस से पचीस लाख रुपये का कपास हुआ और शैलेश के परिवार ने राजकोट में ज़मीन भी ली लेकिन अब वो कर्ज़े के कारण बिक गई है। तब भी पूरा कर्ज़ नहीं चुक पा रहा है। पिछले तीन साल से जिन खेतों से प्रति एकड़ 15 क्विंटल कपास हो रहा था, मुश्किल से 3 एकड़ ही कपास पैदा हो रहा है। कपास की कीमत भी कमती जा रही है। लिहाज़ा उसका कर्ज़ा बढ़ते बढ़ते 30 लाख का हो गया।

    गांधी के पोरपंबर का रहने वाला है शैलेश का परिवार। शैलेश एक अज्ञानी किसान नहीं है। उसने बताया कि गुजरात में चार प्रकार के किसान हैं। एक बहुत अमीर किसान हैं जिनके पास इफ़रात ज़मीनें हैं। जो अपनी ज़मीन किराये पर देकर पैसा बना लेता है। दूसरा किसान जिसके पास ज़मीन होती है और कुछ पैसा होता है जो आस पास से पैसे लेकर खेती करता है। एक तीसरा किसान है जिसके पास ज़मीन तो है मगर खेती के लिए पैसे नहीं है। ये शैलेश जैसे किसानों को किराये पर दे देता है जो अपने रिश्तेदारों से पैसे लेकर खेती करते हैं। शैलेश ने बताया कि पंद्रह साल से खेती कर रहा है। सिर्फ तीन बरस अच्छी कमाई की। उसने कहा कि दस साल से मक्के का भाव 1200-1500 रुपये प्रति क्विंटल के आस पास ही है। जबकि लागत बढ़ चुकी है। इसका मतलब है कि शैलेश जैसे किसान को खेती की अर्थव्यवस्था का ज्ञान है।

    कुछ महीने पहले शैलेश ने मुझे ई मेल किया था कि वो आत्महत्या करने जा रहा है। सर, आधी रात को ईमेल पढ़ते ही मेरे हाथ-पांव फूल गए थे। अहमदाबाद में अपने सहयोगी राजीव पाठक को इत्तला किया। राजीव ने स्थानीय प्रशासन को बताया । गुजरात के ज़िला प्रशासन ने तुरंत कदम उठाए। जहां तक मुझे याद है सीधे कलेक्टर ने फोन कर दिया और ईमेल की कापी मांगी। आज शैलेश ने उस दिन की घटना बताई। कहा कि पुलिस ने पांच घंटे के लिए थाने में बिठा लिया। पूछा कि रवीश कुमार को चिट्ठी क्यों लिखी। आत्महत्या क्यों कर रहे हो लेकिन कर्ज़े को लेकर कुछ नहीं किया। शैलेश ने बताया कि प्रशासन ने माना ही कि मेरा कोई कर्ज़ा है। उसके बाद कुछ नहीं हुआ। तीस लाख के कर्ज़े ने उसके रास्ते बंद कर दिये हैं सर।

    इस बीच मैं शैलेश को भूल गया। कल फिर एक ईमेल आया कि मैं गुजरात का हूं आपसे मिलना चाहता हूं। मुझे नहीं मालूम था कि वो शख्स इस बार मेरे सामने होगा। वो कहता रहा कि प्रधानमंत्री को किसानों से टैक्स लेना चाहिए लेकिन सबकी कमाई पंद्रह हज़ार फिक्स कर दें ताकि हम भूखे न मरें। उसने यह भी बताया कि अगर वो कर्ज़ा चुका सका तो एक डिजिटल तबेला बनाएगा भारत का सबसे बड़ा। ज़ाहिर है उसकी सोच में उम्मीदों के लिए अब भी जगह बची है। पर एक शर्त पर कि मैं दुनिया को बता दूं कि उसने देश के तीस नामचीन लोगों से कर्जा चुकाने की मदद मांगी है।

    इनमें मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, अजय देवगन, रोहित शर्मा, सचिन तेंदुलकर, आमिर ख़ान, कुमारमंगलम बिड़ला, जूही चावला, विराट कोहली शामिल हैं। शैलेश चाहता है कि मैं मीडिया के ज़रिये इनसे अपील करूं। यह उसका पहला और आख़िरी रास्ता है। मैं उसे समझाता रहा कि कसम खाओ कि दूसरा रास्ता नहीं अपनाओगे। वो कमरे से किसी बाग़ी की तरह निकल गया। कहता हुआ कि अभी भी वो उम्मीद के रास्ते चलेगा लेकिन दूसरे रास्ते के बारे में कुछ नहीं कह सकता।

    प्रधानमंत्री जी, मैं हिल गया हूं। मुझे रोज़ दस लोग आकर कई तरह की बातें बता जाते हैं। फलाने बैंक में दस हज़ार करोड़ का घोटाला है। किसी हेल्थ विभाग में बहरे बच्चों के लिए सरकारी योजना में लूट चल रही है। मैं इन सबके लिए आपको पत्र नहीं लिखता। पता नहीं क्यों आप से उम्मीद हो गई। आपको लिख दिया। शैलेश को सरकार से उम्मीद नहीं है। उसने कहा सरकार कुछ नहीं करेगी। मुझे थाने में बिठाएगी और तोड़ देगी। सर, उसके साथ ऐसा मत होने दीजिएगा। मैंने पत्र लिखने से पहले वो क्या है, कौन है इसकी कोई जांच नहीं की है। बस उसी की बातों को प्रमाण मानकर आपको सार्वजनिक पत्र लिख रहा हूं। कुछ तो दिखा उसकी आंखों में यकीन करने का जी चाहने लगा।

    आपके कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहीं भाषण दिया है। अखिल भारतीय किसान सशक्तीकरण अभियान के उदघाटन के अवसर पर। दिल्ली के ताल कटोरा स्टेडियम में उन्होंने कहा कि ” समय के चलते आज का कृषक अज्ञानता, व्यसन, निराशा और छोटी सोच का शिकार हो गया है। नैतिक और मानवीय मूल्यों में उनका मनोबल भी कम हुआ है। व्यसनों और सामाजिक कुरीतियों का भी शिकार बना है। इतना तो था ही फिर उसमें ग्लोबल वार्मिंग और क्लामेट चेंज ने भी अपना कहर ढाया है। गांधी जी ने भी कहा कि प्रकृति के पास हर मनुष्य के नीड के लिए पर्याप्त है। लेकिन ग्रीड( लोभ-लालच) के लिए कितना भी मिले कम है। किसान यथार्थ कृषि ज्ञान, योग्य तकनीकि एवं संगठन की भावना को भुला पाने से कष्टदायक जीवन जी रहा है।”

    अगर ये कृषि मंत्री की राय है तो मैं चुप रहना पसंद करूंगा। मैं नहीं चाहता कि किसी का ध्यान इस पत्र के बहाने शैलेश गोरयानी की पीड़ा से भटके। शैलेश की बातों से कही नहीं लगा कि वो लोभ लालच का शिकार हुआ है। अज्ञानी है।  बल्कि खेती को उद्यमी के स्तर पर ले जाने की आपकी बातों से प्रभावित लगा। ख़ैर मुझे आरोप- प्रत्यारोप में नहीं पड़ना है। मैं बस अपने प्रधानमंत्री को यह बात बता रहा हूं। हर किसान दिल्ली आकर किसी पत्रकार तक नहीं पहुंच सकता। आप चाहें तो इसे कुछ कर दिखाने का एक मौका दे सकते हैं। मैं डर रहा हूं इस पत्र को लिखते हुए। न मालूम पुलिस वाले उसे उठाकर उसके साथ क्या करेंगे। आपको बता दिया है। सर, आप देख लीजिएगा। पोरबंदर से निकल कर किसी ने हम सबको आज़ादी दिलाई थी, आज उसी के पोरबंदर का एक नौजवान हम सबसे ज़िंदगी मांग रहा है। आशा, आप उसे निराश नहीं करेंगे।

    आपका- रवीश कुमार, भारत का एक सामान्य नागरिक।

    गरीब के लिए ईदुल अज़हा बस एक ख्वाब

    गरीब की ईदुल अज़हा
                                        घर में तमाम मर्द व औरतें और बच्चे उदास बैठे कुर्बानी के गोश्त का इन्तिज़ार कर रहे है....
    सुबह १० बज गये,
    फ़िर ११ भी बज गये,
    राह तकते हुऐ एक घंटा और गुज़र गया कि शायद कुर्बानी का गोश्त खाने को मिल जाये, और जो खुशी जानवर की कुर्बानी से जुडी हुई है उसका एहसास हो, शायद कोई गोश्त लेकर आता हो! मगर लम्बे इन्तिज़ार में भूख के सामने ज़ायका लेने की ख्वाहिश दम तोड देती है और गरीबी और मायूसी के हालात में दाल-चावल पकाने की तैयारी शुरु होती है। जिस तरह इन्तिज़ार करते करते दोपहर गुज़र जाती है उसी तरह शाम भी उम्मीद के धुंधलके में बीत जाती है और यूं ईदुल अज़हा का खुशियों भरा दिन बीत जाता है।
                                              यह कोई बनावटी कहानी नही बल्कि सच्चे हालात है जो शहर के बाहरी इलाकों और कच्ची बस्तियों के ज़्यादातर घरों में ईदुल अज़हा के दिनों में सामने आते हैं। उस दिन गरीबों की परेशानी दोगुनी युं भी हो जाती है कि बाज़ार में गोश्त नही मिलता और सब्ज़ी तरकारी वाले भी दुकान नही लगाते और शायद रंजो-गम और मायूसी की वजह से सब्ज़ी तरकारी लेने बाज़ार जाने का भी दिल नहीं करता।
                                                  इधर शहरी इलाकों में हाल यह होता है कि एक खानदान में कई कई जानवर ज़िबह हो रहे हैं जिनके गोश्त उन रिश्तेदारों के यहां भी भेजे जा रहे हैं जिन्होनें खुद कुर्बानी की ह्हैं और गोश्त भरा पडा है और यह रिश्तेदार अपने साहिबे हैसियत रिश्तेदारों के यहां गोश्त पहुंचा रहे है।
         एक और रस्म है कि बेटी के ससुराल में पूरी-पूरी रानें ही नही बल्कि पूरे पूरे बकरे "ईदी" के तौर पर भेजे जा रहे हैं, भले ही बेटी की सुसराल में कई कई कुर्बानियां होती हों। यह एक ऐसी रस्म है कि जिस पर अमल करना फ़र्ज़ समझा जाता है
    इसके अलावा बहुत से मज़ह्बों के पेशेवर भिखारी घर घर पहुंच कर गोश्त का अच्छा खासा ज़खीरा कर लेते हैं। इससे होता यह है कि कुर्बानी के गोश्त का एक बडा हिस्सा बेकार जगहों पर इस्तेमाल हो जाता है जिसकी वजह से वह गरीब और ज़रुरतमंद महरुम रह जाते हैं जो मांगने में शर्म महसुस करते हैं। आम मुसलमानों तक गोश्त पंहुचाने की ज़हमत से यह भिखारी बचा लेते हैं और अगर कुर्बानी करने वाले को गरीबों से हमदर्दी और मुह्ब्बत का जज़्बा ना हो तो बात और तकलीफ़ देने वाली हो जाती हैं। ईदुल अज़हा में छुपा हुऐ कुर्बानी के ज़ज़्बे का मकसद तो यह है कि इसका फ़ायदा गरीबों तक पंहुचें, उनको अपनी खुशी में शामिल करने का खास इंन्तिज़ाम किया जायें, ताकि उस एक दिन तो कम से कम उनको अपने नज़र अंदाज़ किये जाने का एहसास न हो और वह कुर्बानी के गोश्त के इन्तिज़ार में दाल चावल खाने पर मजबूर न हों।
    अल्लाह आपको भी और मुझे भी दींन की सही समझ अता करे
    आमीन,
    सुम्मा आमीन।
    #प्रतिलिपी

    Saturday, September 12, 2015

    गुमशुदा की तलाश

    भाईयों ये एक पोस्ट आई है। एक भाई की जानिब से
    अगर इन भाई कइ बारे में कुछ भी पता लगे तो ज़रूर खबर करें
    मीनारा मस्जिद के इमाम हाफिज नुरुल हसन साहब का लड़का अबु हुरैरा 9 सितम्बर सुबह 6 बजे घर से मदरसा बैतुल उलूम सरायमीर(आजमगढ़)पढ़ने के लिए निकला मगर न ही मदरसा पहुंचा न ही वापस घर आया  2 दिन तक तलाश करने पर कोई सुराग नहीं मिल पाया  कल 11/9/2015 को #Ruc के उप ज़िला अध्यक्ष #मास्टर_तारिक़ साहब के साथ सरायमीर थाने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी गयी है नोट: आप सबसे गुमशुदा की तलाश में मदद की अपील है फ़ोटो में फ़ोन नंबर हैं।
    अल्लाह से दुआ है ये भाई जहा कही भी हो सही सलामत हो और अल्लाह अज्जावजल जल्द से जल्द
    इन भाई को अपने माँ बाप के पास पहुचाये।
    शेयर करे ताकि ये भाई अपने घर वालो से जल्द मिल जाये।
    शुक्रिया